Thursday, 9 February 2012

चार बूँद

मन की गागर छलके जाय ,चार बूँद चार बूँद.
इन बूंदों में मेरे साए ,बस जाए
मैं तो नित पीती रहूँ ..चार घूँट चार घूँट
पर बरबस वो छलके जाए ...चार बूँद चार बूँद..
कौन कौन से करूं उपाए ..मिट जाए
प्यास ..
भर जाए घट..
चार बूँद चार बूँद...

13 comments:

  1. वाह ...बहुत बढि़या।

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  2. kavitaa thodee see lambee hotee
    yun lagtaa hamne bhee chaar boond peelee

    chhotee par badhiyaa

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  3. बेहतरीन भाव पूर्ण सार्थक रचना,

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  4. बहुत बढ़िया प्रस्तुति
    आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  5. बेहतरीन रचना.......

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  6. लगता है कुछ गूढ अर्थ है, संख्या चार का रहस्य क्या है?

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  7. बहुत बढि़या सार्थक प्रस्तुति!

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