Friday, 13 January 2012

गोते ....

सोते सोते गोते लेते
सपनों के कुछ देश में
बिता आते कुछ पल वहां पर
बदले बदले वेश में ..

रोते रोते गोते लेते

भावों के परिवेश में
बह जाते कुछ 'क्षण ' वहां  पर
मोतियों के वेश में ..

बोते बोते गोते लेते

ज़िन्दगी के 'शेष ' में
कर्म -अकर्म में बंध परस्पर 
 सिमटे 'समावेश' में

आते जाते गोते लेते

खोने पाने के पेच में
'जोड़ -घटाव ',में उलझ उलझ हम
 रह जाते 'अवशेष  ' में 


 कुछ ढूँढें चलते  चलते
इस अंतिम सन्देश में
सब ही हैं मित्र हमारे
उस प्रभु के वेश में

10 Comments:

At 13 January 2012 at 22:23 , Blogger रश्मि प्रभा... said...

आते जाते गोते लेते
खोने पाने के पेच में
'जोड़ -घटाव ',में उलझ उलझ हम
रह जाते 'अवशेष ' में ...यही जीवन है

 
At 13 January 2012 at 22:44 , Blogger S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर रचना , बधाई.

 
At 13 January 2012 at 23:36 , Blogger चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति है आपकी

 
At 13 January 2012 at 23:45 , Blogger अनुपमा पाठक said...

कुछ ढूँढें चलते चलते
इस अंतिम सन्देश में
सब ही हैं मित्र हमारे
उस प्रभु के वेश में
बहुत सुन्दर!

 
At 14 January 2012 at 02:08 , Blogger नीरज गोस्वामी said...

वाह...बहुत सुन्दर रचना...बधाई स्वीकारें
नीरज

 
At 14 January 2012 at 03:35 , Blogger sangita said...

कुछ ढूँढें चलते चलते
इस अंतिम सन्देश में
सब ही हैं मित्र हमारे
उस प्रभु के वेश में |बहुत सुन्दर रचना,बधाई...........

 
At 14 January 2012 at 03:48 , Blogger मनीष सिंह निराला said...

बेहतरीन शब्द सयोंजन ..!
मन को छू गई आपकी ये लयबद्ध रचना !
आभार !

 
At 14 January 2012 at 03:49 , Blogger मनीष सिंह निराला said...

बेहतरीन शब्द सयोंजन ..!
मन को छू गई आपकी ये लयबद्ध रचना !
आभार !

 
At 14 January 2012 at 16:06 , Blogger Savita said...

Very beautiful poem Reetu. Loved reading it.

 
At 14 January 2012 at 21:18 , Blogger Atul Shrivastava said...

बढिया भावनात्‍मक प्रस्‍तुति।

 

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