Thursday, 2 February 2012

डर

यह कविता मैंने सन १९८८  में लिखी थी ..

अँधेरी रात के सायों से कितना डर लगता है 
कभी भय से ,तो कभी अपनाप ह्रदय धड़कता है ..

यों तो चाँद भी होता है रात में ,
तारे भी जगमाते जिसके प्रकाश में 
पर अमावस्या में चाँद भी नहीं दीखता है 
अँधेरी रात के सायों से कितना डर लगता है ..

यों तो उज्ज्वल प्रकाशमय सुबह भी होती है 
जब चिड़ियें चहचहाती और कोयल कूकती हैं 
पर आजकल तो प्रकाश से भी डर लगता है 
कभी भय से तो कभी अपनाप ह्रदय धड़कता है 
सुबह के उजाले से भी कितना डर लगता है 

(तस्वीर गूगल से ली है )

10 Comments:

At 2 February 2012 at 08:51 , Blogger अमित श्रीवास्तव said...

सबसे अधिक डर तो कभी कभी खुद से लगता है |

 
At 2 February 2012 at 08:55 , Blogger मनोज कुमार said...

रचना अच्छी लगी। स्वागत।

 
At 2 February 2012 at 09:43 , Blogger sangita said...

रचना अच्छी लगी। स्वागत।

 
At 2 February 2012 at 10:27 , Blogger डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" said...

dar lagnaa swaabhik hai
parmaatmaa mein vishwaas hee iskaa uttar hai
puraanee magar achhee rachna

 
At 2 February 2012 at 11:29 , Blogger Atul Shrivastava said...

अच्‍छी रचना।
वैसे 24 सालों में अब तो डर चला गया होगा.......

 
At 2 February 2012 at 17:42 , Blogger dinesh aggarwal said...

सचमुच उजाले एवं सुबह का डर बहुत ही खतरनाक होता है
सुन्दर अभिव्यक्ति...... सराहनीय....
नेता,कुत्ता और वेश्या

 
At 2 February 2012 at 18:42 , Blogger NISHA MAHARANA said...

पर आजकल तो प्रकाश से भी डर लगता है.kai bar aisa hota hai jb ujala apni aankhon ko chubhta hai.bahut achcha.

 
At 2 February 2012 at 21:33 , Blogger RITU said...

हाँ ..तब की अभिव्यक्तियाँ हैं ,न जाने क्या सोच कर लिखी थी खुद याद नहीं..:)

 
At 2 February 2012 at 21:35 , Blogger RITU said...

आप सभी का धन्यवाद 'कलमदान ' पर पधारने के लिए ..

 
At 3 February 2012 at 03:17 , Blogger वन्दना said...

satya kaha .......sundar prastuti.

 

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