Wednesday, 11 April 2012

शान्ति

पाप पुण्य में डूबे जब तब खोज रहे मन की शान्ति को 
अब न समझे थे न तब समझे थे ,
भटक रहे जिस अनसुलझी भ्रान्ति को..
न मन से हैं न तन से हैं ,न अपनों के न गैरों के 
फिर भी खोज रहे अपनेपन को 
शुरू करें और खुद अपनेपर ही ख़तम करें..
ये स्वार्थ के अनुयायी ,अपनी ही अभिव्यक्ति को 
जिस राह चलें उस पर ही रुक जाएँ 
चलते चलते भटक जाएँ ,फिर अटके कभी लटक जाएँ 
अटके अटके ही चिल्लाएं 
शान्ति शान्ति शान्ति को 
नहीं मिलेगी नहीं मिलेगी , यु दिए की लौ नहीं जलेगी
राह कठिन है परिश्रम है.., वहाँ मिथ्या है भ्रम है..
जब अपनों को अपनाओगे 
शान्ति वहीँ पा जाओगे..

10 Comments:

At 12 April 2012 at 00:42 , Blogger dheerendra said...

जब अपनों को अपनाओगे शान्ति वहीँ पा जाओगे..
बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,

MY RECENT POST ...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

 
At 12 April 2012 at 01:16 , Blogger रश्मि प्रभा... said...

न मन से हैं न तन से हैं ,न अपनों के न गैरों के
फिर भी खोज रहे अपनेपन को ... और दूसरों को दोष दे रहे

 
At 12 April 2012 at 06:42 , Blogger चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ said...

वाह वाह क्या बात है!

उल्फ़त का असर देखेंगे!

 
At 12 April 2012 at 08:39 , Blogger S.N SHUKLA said...

bahut khoobasoorat pravishti.

 
At 12 April 2012 at 20:23 , Blogger sushma 'आहुति' said...

यार्थार्थ को दर्शाती अभिवयक्ति.....

 
At 12 April 2012 at 22:00 , Blogger डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" said...

kis ko milee hai shantee
jo hamko milegee
jeevan kee gaadee yun hee chalegee
prayatn karte raho apno ko apnaate raho
ek pakad aayegaa ,doosraa bhaag jaayegaa
kashamkash mein jeevan gujar jaayegaa

 
At 12 April 2012 at 22:09 , Blogger डा.राजेंद्र तेला"निरंतर"(Dr.Rajendra Tela,Nirantar)" said...

आपकी कविता पढ़ कर मैंने तुरंत कुछ लिख दिया
किसी ने कहा मुझसे
जब अपनों को अपनाओगे
शान्ति वहीँ पा जाओगे
कितना भ्रम है
मन को खुश रखने का
साधन है
किस को मिली है शांती
जो तुम्हें मिल जायेगी
जीवन की गति
यूँ ही चलती रही है
यूँ ही चलती रहेगी
प्रयत्न करते रहो
अपनों को अपनाते रहो
एक पकड़ में आयेगा
दूसरा छूट भागेगा
इस कशमकश में जीवन
गुजर जाएगा
अगर पानी है शांती
अपेक्षा करना छोड़ दो
जो है जैसा भी है
स्वीकारना प्रारम्भ करो
शांती भी नतमस्तक
हो जायेगी
तुम्हारे चरणों में गिर
जायेगी
बची खुची ज़िन्दगी
खुशी से गुजर जायेगी

 
At 16 April 2012 at 17:05 , Blogger Savita said...

Love your poetry, your sentiments and also loved Dr.Rajendra Tela's sentiments. Beautiful!

 
At 16 April 2012 at 19:26 , Blogger RITU said...

बहुत भावपूर्ण बात एक स्वाभाविक अंदाज़ में आप ने बयान कर दी
धन्यवाद

 
At 16 April 2012 at 19:31 , Blogger RITU said...

आप सभी का समय निकाल कर मेरी कविता को पढने के लिए व उसे पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

 

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