Wednesday, 11 April 2012

शान्ति

पाप पुण्य में डूबे जब तब खोज रहे मन की शान्ति को 
अब न समझे थे न तब समझे थे ,
भटक रहे जिस अनसुलझी भ्रान्ति को..
न मन से हैं न तन से हैं ,न अपनों के न गैरों के 
फिर भी खोज रहे अपनेपन को 
शुरू करें और खुद अपनेपर ही ख़तम करें..
ये स्वार्थ के अनुयायी ,अपनी ही अभिव्यक्ति को 
जिस राह चलें उस पर ही रुक जाएँ 
चलते चलते भटक जाएँ ,फिर अटके कभी लटक जाएँ 
अटके अटके ही चिल्लाएं 
शान्ति शान्ति शान्ति को 
नहीं मिलेगी नहीं मिलेगी , यु दिए की लौ नहीं जलेगी
राह कठिन है परिश्रम है.., वहाँ मिथ्या है भ्रम है..
जब अपनों को अपनाओगे 
शान्ति वहीँ पा जाओगे..

10 comments:

  1. जब अपनों को अपनाओगे शान्ति वहीँ पा जाओगे..
    बहुत अच्छी अभिव्यक्ति,सुंदर रचना,

    MY RECENT POST ...काव्यान्जलि ...: आँसुओं की कीमत,....

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  2. न मन से हैं न तन से हैं ,न अपनों के न गैरों के
    फिर भी खोज रहे अपनेपन को ... और दूसरों को दोष दे रहे

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  3. bahut khoobasoorat pravishti.

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  4. यार्थार्थ को दर्शाती अभिवयक्ति.....

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  5. kis ko milee hai shantee
    jo hamko milegee
    jeevan kee gaadee yun hee chalegee
    prayatn karte raho apno ko apnaate raho
    ek pakad aayegaa ,doosraa bhaag jaayegaa
    kashamkash mein jeevan gujar jaayegaa

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  6. आपकी कविता पढ़ कर मैंने तुरंत कुछ लिख दिया
    किसी ने कहा मुझसे
    जब अपनों को अपनाओगे
    शान्ति वहीँ पा जाओगे
    कितना भ्रम है
    मन को खुश रखने का
    साधन है
    किस को मिली है शांती
    जो तुम्हें मिल जायेगी
    जीवन की गति
    यूँ ही चलती रही है
    यूँ ही चलती रहेगी
    प्रयत्न करते रहो
    अपनों को अपनाते रहो
    एक पकड़ में आयेगा
    दूसरा छूट भागेगा
    इस कशमकश में जीवन
    गुजर जाएगा
    अगर पानी है शांती
    अपेक्षा करना छोड़ दो
    जो है जैसा भी है
    स्वीकारना प्रारम्भ करो
    शांती भी नतमस्तक
    हो जायेगी
    तुम्हारे चरणों में गिर
    जायेगी
    बची खुची ज़िन्दगी
    खुशी से गुजर जायेगी

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    1. बहुत भावपूर्ण बात एक स्वाभाविक अंदाज़ में आप ने बयान कर दी
      धन्यवाद

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  7. Love your poetry, your sentiments and also loved Dr.Rajendra Tela's sentiments. Beautiful!

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  8. आप सभी का समय निकाल कर मेरी कविता को पढने के लिए व उसे पसंद करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद

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