Friday, 16 December 2011

चाहत (from the archives-1989)

मैंने चाहा मै एक चिड़िया होती ,
उड़कर मैं आसमान को छूती ,
पेड़ों से मैं बातें करती 
पुष्पों को अपना मित्र बनाती 
मैं बस अनंत आकाश में उडती जाती ,उडती जाती 
न समय की चिंता ,न काल का डर
एक छोटे वृक्ष पे मैं बना अपना घर 
उडती जाती उडती जाती 
परन्तु अब है बन्धनों का डर 
अपनी ही जाती ,अपनों का डर 
चिड़िया मैं क्यों न बन पाती 
ये आस बस आस बन 
मन में रह जाती ,मन में रह जाती..


1 comment:

  1. किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।

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