Saturday, 24 December 2011

शान्ति

पाप पुण्य में डूबे जब तब खोज रहे मन की शान्ति को 
अब न समझे थे न तब समझे थे ,
भटक रहे जिस अनसुलझी भ्रान्ति को..
न मन से हैं न तन से हैं ,न अपनों के न गैरों के 
फिर भी खोज रहे अपनेपन को 
शुरू करें और खुद अपनेपर ही ख़तम करें..
ये स्वार्थ के अनुयायी ,अपनी ही अभिव्यक्ति को 
जिस राह चलें उस पर ही रुक जाएँ 
चलते चलते भटक जाएँ ,फिर अटके कभी लटक जाएँ 
अटके अटके ही चिल्लाएं 
शान्ति शान्ति शान्ति को 
नहीं मिलेगी नहीं मिलेगी , यु दिए की लौ नहीं जलेगी
राह कठिन है परिश्रम है.., वहाँ मिथ्या है भ्रम है..
जब अपनों को अपनाओगे 
शान्ति वहीँ पा जाओगे..

1 Comments:

At 25 December 2011 at 20:52 , Blogger Atul Shrivastava said...

बढिया सीख देती रचना।

 

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

Links to this post:

Create a Link

<< Home