Thursday, 17 July 2014

हारश्रिंगार ..



जीत में हो या चाहत में हो ,हर हार में एक  मज़ा यार है 
सोने चांदी के हों या पुष्पों के  ,हर हार में छुपा प्यार है 
हर जीत पे सजता  हार है ..
कभी प्रिय के तो कभी हरी के ,मुख का ये श्रृंगार है 
हार कर दिल जीत होती  ,हार  प्रिय प्रेम का उपहार है 
हार जीत को प्रेरित करती ,कभी हार ..वैभव का आधार है 
बचपन से बुढापा हार कर ,सहर्ष जीवन  बनता आधार है 
यूँ परस्पर जीवन मृत्यु ,ये जीवन हारश्रिंगार है ...
(चित्र गूगल से साभार )


3 Comments:

At 17 July 2014 at 10:12 , Blogger महेश कुशवंश said...

अच्छा लिखा शुभकामनायें

 
At 18 July 2014 at 04:31 , Blogger सदा said...

बेहतरीन प्रस्‍तुति

 
At 18 July 2014 at 23:00 , Blogger मनोज कुमार said...

हृदय फलक पर गहरी छाप छोड़ती है ।

 

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