Monday, 19 December 2011

कोशिश

पर्वतों से निकलती टेढ़ी मेढ़ी धारा से 
                                     मैं श्वेत निर्मल नदी सी बहुंगी 
ऊँचे नीचे ,पथरीले ,रास्तों से गुज़र के 
                                    मैं समतल  चलने की कोशिश करुँगी 


साथ पुष्पों के कांटे भी होते हैं अक्सर 
                                   मैं पुष्प बनकर सुगन्धित करती रहूंगी 
जो मसलकर तोड़ डालेगा कोई 
                                  तो वही हाथ महकाने की कोशिश करुँगी 


जो रूठे मनाऊँ ,अगर फिर रूठ जाएँ 
                                 तो फिर से मानाने की कोशिश करूंगी 
इतनी शक्ति मुझे दोगे जो  मेरे साईं 
                                 तो सदा जोड़ने की मैं कोशिश करूंगी 

4 comments:

  1. आपकी प्रवि्ष्टी की चर्चा कल बुधवार के चर्चा मंच पर भी की जा रही है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल उद्देश्य से दी जा रही है!

    ReplyDelete
  2. अनेकानेक धन्यवाद व आभार

    ReplyDelete
  3. सुंदर रचना।
    गहरे अहसास।

    ReplyDelete
  4. फिर से प्रशंसनीय रचना - बधाई

    ReplyDelete