Tuesday, 1 November 2016

मैं शीशा हूँ

                                      



ता उम्र कोशिशें करते रहे की शीशा बन सकें 
जो अन्दर से हैं वो बाहर भी दिख सकें 
पर दिख न सका वो अक्स जो धूप था 
बादलों की आगोश में जो एक तेज़ था 
करते रहे मुहब्बत हम तो हमी से 
सीखे न कोई गुर ,इस तकदीर से 
कोई दोस्त न मिला मुकम्मल हमें  
पाया  सिफर ही बस इम्तेहान में 
क्यों रोज़ देनी हैं खुद को ही तसल्लियाँ 
क्यों छा जाती हैं दिलों पर बदलियाँ 
पहचानते क्यों नही की में शीशा हूँ ,
तराशा गया हूँ में ,के मैं शीशा हूँ 
बढ़ाकर के नूर एकदिन हो जाऊँगा कोहिनूर,
तब हमदर्द बनकर आओगे राहों में ज़रूर 
पढता ही रहूँगा फिर भी अपना ही अक्स मैं 
दीखता ही रहुंगा ,मुझी में से मैं ..
खा खा कर ठोकरे हो जाऊं चकनाचूर 
दीखता ही रहूँगा हर एक कांच से भी नूर 
क्यूंकि तराशा गया हूँ मैं 
पर मैं एक शीशा हूँ ....

  ( चित्र गूगल से साभार)

7 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "जीवन के यक्ष प्रश्न - ब्लॉग बुलेटिन“ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. अलग रंग -ढंग से सजी सुन्दर पंक्तियाँ बहुत दिनो के बाद आपको लिखते देखकर खुशी हुई।

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    1. धन्यवाद, अभी कोशिश रहेगी की निरंतर लिखती रहूँ...

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