Monday, 20 July 2015


अपनापन ...







कुछ अपनों को , अपना बनाने में 
हम अपनापन खोते रहे
कुछ गैरों से उनको बचाने में
हम अपनापन खोते रहे
ताउम्र मिली तकलीफों में
उनको आजमाने में ,
हम अपनापन खोते रहे
हर रोज़ बदलते मयखानों में
हम अपनापन खोते रहे
कुछ रिश्ते अनजानों में 
हम अपना पन खोते रहे 
कहीं किन्हीं गिरेबानों से
हम अपनापन खोते रहे..

5 Comments:

At 21 July 2015 at 01:25 , Blogger yashoda agrawal said...

आपकी लिखी रचना पांच लिंकों का आनन्द में बुधवार 22 जुलाई 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

 
At 21 July 2015 at 03:44 , Blogger रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार (22-07-2015) को "मिज़ाज मौसम का" (चर्चा अंक-2044) पर भी होगी।
--
सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
--
चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

 
At 21 July 2015 at 22:51 , Blogger RITU said...

आपका बहुत बहुत धन्यवाद..!

 
At 21 July 2015 at 22:52 , Blogger RITU said...

बहुत अंतराल बाद आपको सुनकर आनंद हुआ ..आपका धन्यवाद !!

 
At 22 July 2015 at 02:57 , Blogger Digamber Naswa said...

बिलकुल होता है ... अपनों को अपना बनाते बनाते कईयों को खो देता है इंसान ...

 

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