Sunday, 18 December 2011

आवरण

आँखों के सामने असंख्य पुस्तकों का मेला लगा था..सब सस्ते दामों पर  मिल रही थी , कौनसी लूं? ..प्रश्नचिन्ह था..मन चाह रहा था की कोई आकर्षक सी लगने वाली मोटी सी किताब ले लेते हैं..पर फिर ख़याल आया की पता नहीं उस आकर्षक आवरण के अन्दर क्या होगा..?
 भीड़ में, कितनी ही  पुस्तकों को उठा उठा कर समीक्षा की होगी, पर मन को कोई नहीं भाई ..उनका सस्ता मूल्य भी बेकार था हमारे लिए..कैसी परिस्थिति है ?..न जाने  क्यों पुस्स्तकें अजनबियों की तरह बिखरी पड़ी थी और में उनके सामने महामूर्ख की भाँती खड़ी थी ..
सच्चाई से कोई छिप नहीं सकता ..
ये पुस्तकें आइना दिखा रही थी हमें.., की जिस प्रकार बाहरी आवरण से पुस्तक के प्रष्ठों का अनुमान नहीं लगाया  जा सकता ,उसी प्रकार ,मनुष्य के भी बाहरी रेहन सेहन से ये कदाचित तय कर पाना कठिन है की वो अन्दर से कैसा है ,उसकी आत्मा कैसी है..
सिर्फ उसी पुस्तक के बारे में हम पक्के तौर पर अपनी राय  दे सकते हैं जिसे पढ़ा हो..
सही भी  है ...
वही मनुष्य घर करता है ह्रदय में जिसे हमने पास से देखा हो ,.. पढ़ा हो..
थोड़ी सी कहानी पढने पर  भी आप किताब पूरी ख़तम कर पायेंगे ,ये मै पक्के तौर पे नहीं कह सकती ..
इसलिए आदमी को भी आधा अधूरा जान कर आप तय नहीं कर सकते के वो उम्र भर आपका साथ देगा या नहीं..
ढेर चाहे पुस्तकों का हो या मनुष्य का ...बाहरी चोला कभी भी आत्मा का प्रतिबिम्ब नहीं बन सकता..
मैंने लाख चाहा पर अपरिचित ढेर में से कोई परिचित किताब न मिली ...मिली तो उन्ही पंक्तियों में जिनके बारे में मैंने पहले से पढ़ा था..

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